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1.क्या खोया, क्या पाया जग में Hindi Poem on Life Struggle

क्या खोया, क्या पाया जग में, मिलते और बिछड़ते मग में, मुझे किसी से नहीं शिकायत,

यद्यपि छला गया पगपग में, एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें।

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी, जीवन एक अनन्त कहानी, पर तन की अपनी सीमाएँ, यद्यपि सौ शरदों की वाणी,

इतना काफी है अन्तिम दस्तक पर खुद दरवाजा खोलें। जन्ममरण का अविरत फेरा, जीवन बन्जारों का डेरा,

आज यहाँ, कल कहाँ कूच है, कौन जानता, किधर सवेरा, अँधियारा आकाश असीमित, प्राणों के पंखों को तौलें।

अपने ही मन से कुछ बोलें! “ मैं चुप हूँ, गाता हूँ। समय की सर्द साँसों ने चिनारों को झुलस डाला,

मगर हिमपात को देती चुनौती एक द्रुममाला, बिखरे नीड़, विहँसी चीड़, आँसू हैं मुस्कानें,

हिमानी झील के तट पर अकेला गुनगुनाता हूँ

  1. यक्ष प्रश्न Hindi Poem on Life Struggle

जो कल थे, वे आज नहीं है। जो आज हैं, वे कल नहीं होंगे। होने, होने का क्रम,

इसी तरह चलता रहोगा, हम हैं, हम रहेंगे, यह भ्रम भी पलता रहेगा।

सत्य क्या है होना या होना? या दोनों ही सत्य हैं? जो है, उसका होना सत्य है, जो नहीं है,

उसका होना सत्य है। मुझे लगता है कि होनाहोना एक ही सत्य के दो आयाम हैं,

शेष सब समझ कर फेर, बुद्धि के व्यायाम हैं। किन्तु होने के बाद क्या होता है, यह प्रश्न अनुत्तरित है।

प्रत्येक नया नचिकेता,इस प्रश्न की खोज में लगा है सभी साधकों को इस प्रश्न ने ठगा है।

शायद यह प्रश्न, प्रश्न ही रहेगा। यदि कुछ प्रश्न अनुत्तरित ही रहें तो इसमें बुराई क्या है? हाँ, खोज का सिलसिला रुके,

धर्म की अनुभूति, विज्ञान का अनुसंधान, एक दिन, अवश्य ही रुद्ध द्वार खोलेगा, प्रश्न पूछने के बजाय यक्ष स्वयं उत्तर बोलेगा।

  1. कौरव कौन, कौन पाण्डव Hindi Poem on Life Struggle

कौरव कौन कौन पांडव, टेढ़ा सवाल है। दोनों ओर शकुनि का फैलाकूट जाल है।

धर्मराज ने छोड़ी नहीं जुए की लत है, हर पंचायत मेंपांचाली अपमानित है।

बिना के कृष्ण आज महाभारत होना है, कोई राजा बने, रंक को तो रोना है।

  1. ऊँचाई Hindi Poem on Life Struggle

ऊँचे पहाड़ पर पेड़ नहीं लगते, पौधे नहीं उगते, ही घास जमती है।

जमती है सिर्फ बर्फ, जो कफन की तरह सफेद और मौत की तरह ठण्डी होती है।

खेलती, खिलखिलाती नदी जिसका रूप धारण कर अपने भाग्य पर बूंदबूंद रोती है।

ऐसी ऊँचाई जिसका परस पानी को पत्थर कर दे,ऐसी ऊँचाई जिसका दरस हीन भाव भर दे,

अभिनन्दन की अधिकारी है, आरोहियों के लिए आमन्त्रण है, उस पर झण्डे गाड़े जा सकते हैं,

किंतु कोई गौरैया, वहाँ भीड़ नहीं बना सकती, कोई थकामाँदा बटोही, उसकी छाँव में पलभर

पलक ही झपका सकता है। सच्चाई यह है कि केवल ऊँचाई ही काफी नहीं होती,

सबसे अलगथलग परिवेश से पृथक्, अपनों से कटाबँटा, शून्य में अकेला खड़ा होना पहाड़ की महानता नहीं,

मजबूरी है। ऊँचाई और गहराई में आकाशपाताल की दूरी है।

जो जितना ऊँचा, उतना ही एकाकी होता है, हर भार को स्वयं ही ढोता है, ‘

चेहरे पर मुस्कानें चिपका, मन ही मन रोता है। जरूरी यह है कि ऊँचाई के साथ विस्तार

जिससे मनुष्य औरों से घुलेमिले, ठूँठसा खड़ा रहे, किसी को साथ ले, किसी के संग चले।

भीड़ में खो जाना, यादों में डूब जाना, स्वयं को भूल जाना, अस्तित्व का अर्थ, जीवन को सुगन्ध देता है।

धरती को बौनों की नहीं, ऊँचे कद के इन्सानों की जरूरत है इतने ऊँचे कि आसमान को छू लें,

नये नक्षत्रों में प्रतिभा के बीज बो लें, किंतु इतने ऊँचे भी नहीं, कि पाँव तले दूब ही जमे, कोई कांटा चुभे,

कोई कली खिले। वसन्त हो, पतझड़, हो सिर्फ ऊंचाई का अंधड़, मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।

मेरे प्रभु! मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना, गैरों को गले गला सकूँ इतनी रुखाई कभी मत देना।

-Hindi Poem on Life Struggle by अटल बिहारी वाजपेयी

  1. हरीहरी दूब पर Hindi Poem on Life Struggle

हरीहरी दूब पर ओस की बूंदें अभी थीं, अब नहीं हैं।

ऐसी खुशियाँ जो हमेशा हमारा साथ दें कभी नहीं थीं, कहीं नहीं हैं।

तलवार की कोख से फूटा बाल सूर्य जब पूरब की गोद में पाँव फैलाने लगा, तो मेरी बगीची का

पत्तापत्ता जगमगाने लगा, मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ,या उसके ताप से भाप बनी

ओस की बूंदों को ढूँढें? सूर्य एक सत्य है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता, मगर ओस भी एक सच्चाई है,

यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है, क्यों मैं क्षणक्षण को जीऊँ कणकण में बिखरे सौन्दर्य को पीऊँ

सूर्य तो फिर भी उगेगा, धूप तो फिर भी खिलेगी, लेकिन मेरी बच्ची की हरीहरी दूब पर,

ओस की बूंद हर मौसम में नहीं मिलेगी।

  1. पहचान Hindi Poem on Life Struggle

पेड़ के ऊपर चढ़ा आदमी ऊँचा दिखाई देता है, जड़ में खड़ा आदमी नीचा दिखाई देता है।

आदमी ऊँचा होता है, नीचा होता है, बड़ा होता है, छोटा होता है, आदमी सिर्फ आदमी होता है।

पता नहीं इस सीधे, सपाट सत्य को दुनिया क्यों नहीं जानती? और अगर जानती है, तो मन से क्यों नहीं मानती?

इसे फर्क नहीं पड़ता कि आदमी कहाँ खड़ा है पथ पर या रथ पर? तीर पर या प्राचीर पर?

फर्क इससे पड़ता है कि जहाँ खड़ा है, या जहाँ उसे खड़ा होना पड़ा है, वहाँ उसका धरातल क्या है?

हिमालय की चोटी पर पहुँच, एवरेस्टविजय की पताका फहरा,

कोई विजेता यदि ईर्ष्या से दग्ध अपने साथी से विश्वासघात करे,

तो क्या उसका अपराध इसलिए क्षम्य हो जाएगा कि वह एवरेस्ट की ऊँचाई पर हुआ था?

नहीं, अपराध अपराध ही रहेगा, हिमालय की सारी धवलता उस कालिमा को नहीं ढक सकेगी,

कपड़ों की दूधिया सफेदी जैसे मन की मलिनता को नहीं छिपा सकती।

किसी सन्त कवि ने कहा है कि मनुष्य के ऊपर कोई नहीं होता, मुझे लगता है कि मनुष्य के ऊपर होता है उसका मन।

छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।

इसीलिए तो भगवान कृष्ण को शस्त्रों से सज्ज, रथ पर चढ़े, कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े अर्जुन को गीता सुनानी पड़ी थी।

मन हार कर मैदान नहीं जीते जाते, मैदान जीतने से मन ही जीते जाते हैं।

चोटी से गिरने से अधिक चोट लगती है। अस्थि टूट जाती, पीड़ा मन में सुलगती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि चोटी पर चढ़ने की चुनौती ही मानें,

इसका अर्थ यह भी नहीं कि परिस्थिति पर विजय पाने की ठानें।

आदमी जहाँ है, वहीं खड़ा रहे? दूसरों की दया के भरोसे पर पड़ा रहे?

जड़ता का नाम जीवन नहीं है, पलायन पुरोगमन नहीं है।

आदमी को चाहिए कि वह जूझे, परिस्थितियों से लड़े, एक स्वप्न टूटे तो दूसरा गढ़े।

किंतु कितना भी ऊँचा उठे, मनुष्यता के स्तर से गिरे, अपने धरातल को छोड़े, अन्तर्यामी से मुँह मोड़े।

एक पाँव धरती पर रख कर ही वामन भगवान ने आकाश, पाताल को जीता था धरती ही धारण करती है,

कोई इस पर भार बने, मिथ्या अभिमान से तने। आदमी की पहचान,

उसके धन या आसन से नहीं होती, उसके मन से होती है। मन की फकीरी पर कुवेर की सम्पदा भी रोती है।

-Hindi Poem on Life Struggle by अटल बिहारी वाजपेयी

  1. मन का संतोष Hindi Poem on Life Struggle

पृथिवी पर मनुष्य ही ऐसा एक प्राणी है, जो भीड़ में अकेला, और अकेले में भीड़ से घिरा अनुभव करता है।

मनुष्य झुण्ड में रहना पसन्द है। घरपरिवार से प्रारम्भ कर, वह बस्तियाँ बसाता है गलीग्रामपुरनगर सजाता है।

सभ्यता की निष्ठुर दौड़ में, संस्कृति को पीछे छोड़ता हुआ, प्रकृति पर विजय, मृत्यु को मुट्ठी में करना चाहता है।

अपनी रक्षा के लिए औरों के विनाश के सामान जुटाता है।आकाश को अभिशप्त, धरती की निर्वसन,

वायु को विषाक्त, जल को दूषित करने में संकोच नहीं करता। किंतु, यह सब कुछ करने के बाद

जब वह एकांत में बैठकर विचार करता है, वह एकांत, फिर घर का कोना हो,

या कोलाहल से भरा बाजार, या प्रकाश की गति से तेज उड़ता जहाज, या कोई वैज्ञानिक प्रयोगशाला,

या मन्दिर या मरधट। जब वह आत्मालोचन करता है, मन की परतें खोलता है, स्वयं से बोलता है,

हानिलाभ का लेखाजोखा नहीं, क्या खोया, क्या पाया का हिसाब भी नहीं,

जब वह पूरी जिन्दगी को ही तौलता है, अपनी कसौटी पर स्वयं को ही कसता है,

निर्ममता से निरखता, परखता है, तब वह अपने मन से क्या कहता है इसी का महत्त्व है, यही उसका सत्य है।

अन्तिम यात्रा के अवसर पर, विदा की वेला में, जब सबका साथ छूटने लगता है,

शरीर भी साथ नहीं देता, तब आत्मग्लानि से मुक्त यदि कोई हाथ उठाकर यह कह सकता है

कि उसने जीवन में जो कुछ किया, सही समझकर किया, किसी को जानबूझकर चोट पहुँचाने के लिए नहीं,

सहज कर्म समझकर किया, तो उसका अस्तित्व सार्थक है, उसका जीवन सफल है।

उसी के लिए यह कहावत बनी है मन चंगा तो कठौती में गंगाजल है।

-Hindi Poem on Life Struggle by अटल बिहारी वाजपेयी

  1. मैं सोचने लगता हूँ Hindi Poem on Life Struggle

तेज रफ्तार से दौड़ती बसें, बसों के पीछे भागते लोग, बच्चे सम्हालती औरतें,

सड़कों पर इतनी धूल उड़ती है कि मुझे कुछ दिखाई नहीं देता, मैं सोचने लगता हूँ।

पुरखे सोचने के लिए आँखें बन्द करते थे, मैं आँखें बन्द होने पर सोचता हूँ।

बसें ठिकानों पर क्यों नहीं ठहरतीं? लोग लाइनों में क्यों नहीं लगते? आखिर यह भागदौड़ कब तक चलेगी?

देश की राजधानी में, संसद के सामने, धूल कब तक उड़ेगी? मेरी आँखें बन्द हैं,

मुझे कुछ दिखाई नहीं देता, मैं सोचने लगता हूँ।

  1. हिरोशिमा की पीड़ा Hindi Poem on Life Struggle

किसी रात को मेरी नींद अचानक उचट जाती है, आँख खुल जाती है,

मैं सोचने लगता हूँ कि जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का आविष्कार किया था:

वे हिरोशिमानागासाकी के भीषण नरसंहार के समाचार सुनकर रात को सोये कैसे होंगे?

दाँत में फँसा तिनका, आँख की किरकिरी, पाँव में चुभा काँटा, आँखों की नींद, मन का चैन उड़ा देते हैं।

सगेसंबंधी की मृत्यु, किसी प्रिय का रहना, परिचित का उठ जाना,

यहाँ तक कि पालतू पशु का भी बिछोह हृदय में इतनी पीड़ा, इतना विषाद भर देता है कि चेष्टा करने पर भी नींद नहीं आती करवटें बदलते रात गुजर जाती है।

किन्तु जिनके आविष्कार से वह अन्तिम अस्त्र बना जिसने : अगस्त उन्नीस सौ पैंतालीस की काल रात्रि को हिरोशिमा

नागासाकी में मृत्यु का ताण्डव कर दो लाख से अधिक लोगों की बलि ले ली,

हजारों को जीवन भर के लिए अपाहिज कर दिया क्या उन्हें एक क्षण के लिए सही,

यह अनुभूति हुई कि उनके हाथों जो कुछ हुआ, अच्छा नहीं हुआ?

यदि हुई, तो वक्त उन्हें कटघरे में खड़ा नहीं करेगा, किन्तु यदि नहीं हुई तो इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करेगा।

-Hindi Poem on Life Struggle by अटल बिहारी वाजपेयी

  1. मोड़ पर Hindi Poem on Life Struggle

मुझे दूर का दिखाई देता है, मैं दीवार पर लिखा पढ़ सकता हूँ, मगर हाथ की रेखाएँ नहीं पढ़ पाता।

सीमा के पार भड़कते शोले मुझे दिखाई देते हैं, पर पाँवों के इर्दगिर्द फैली गर्म राख नज़र नहीं आती।

क्या मैं बूढ़ा हो चला हूँ? हर पचीस दिसम्बर को जीने की एक नई सीढ़ी चढ़ता हूँ, नए मोड़ पर औरों से कम, स्वयं से ज़्यादा लड़ता हूँ।

मैं भीड़ को चुप करा देता हूँ, मगर अपने को जवाब नहीं दे पाता।

मेरा मन मुझे अपनी ही अदालत में खड़ा कर जब जिरह करता है,

मेरा हलफनामा मेरे ही खिलाफ पेश करता है, तो मैं मुकदमा हार जाता हूँ, अपनी ही नज़र में गुनहगार बन जाता हूँ।

तब मुझे कुछ दिखाई नहीं देता, दूर का, पास का, मेरी उम्र अचानक दस साल बढ़ जाती है, मैं सचमुच बूढ़ा हो जाता हूँ।

-Hindi Poem on Life Struggle by अटल बिहारी वाजपेयी

  1. सत्ता Hindi Poem on Life Struggle

मासूम बच्चों, बूढ़ी औरतों, जवान मर्दो की लाशों के ढेर पर चढ़ कर जो सत्ता के सिंहासन तक पहुँचना चाहते हैं

उनसे मेरा एक सवाल है: क्या मरने वालों के साथ उनका कोई रिश्ता था? सही धर्म का नाता,

क्या धरती का भी सम्बन्ध नहीं था? ‘पृथ्वी माँ और हम उसके पुत्र हैं। अथर्ववेद का यह मन्त्र क्या सिर्फ जपने के लिए है, जीने के लिए नहीं?

आग में जले बच्चे, वासना की शिकार औरतें, राख में बदले घर सभ्यता का प्रमाण पत्र हैं, देश भक्ति का तमगा,

वे यदि घोषणापत्र हैं तो पशुता के, प्रमाण हैं तो पतितावस्था के, माँ का निपूती रहना ही अच्छा था।

ऐसे कपूतों से निर्देश रक्त से सनी राजगद्दी, श्मशान की धूल से भी गिरी है, सत्ता की अनियन्त्रित भूख रक्तपिपासा से भी बुरी है।

पाँच हजार साल की संस्कृति: गर्व करें या रोएँ? स्वार्थ की दौड़ में कहीं आजादी फिर से खोएँ।

-Hindi Poem on Life Struggle by अटल बिहारी वाजपेयी

  1. वैभव के अमिट चरणचिह्न Hindi Poem on Life Struggle

विजय का पर्व! जीवनसंग्राम की काली घड़ियों में क्षणिक पराजय के छोटेछोटे क्षण अतीत के गौरव की स्वर्णिम गाथाओं के पुण्य स्मरण मात्र से प्रकाशित होकर विजयोन्मुख भविष्य का

पथ प्रशस्त करते हैं अमावस अभेद्य अंधकार का अन्तःकरण पूर्णिमा का स्मरण कर थर्रा उठता है।

सरिता की मँझधार में अपराजिता पौरुष की सम्पूर्ण उमंगों के साथ जीवन की उत्ताल तरंगों से हँसहँस कर क्रीड़ा करने वाले नैराश्य के भीषण भँवर का कौतुक के साथ आलिंगन आनन्द देता है।

पर्वतप्राय लहरियाँ उसे भयभीत नहीं कर सकतीं उसे चिन्ता क्या है? कुछ क्षण पूर्व ही तो वह स्वेच्छा से

कूलकुछ छोड़कर आया उसे भय क्या है? कुछ क्षण पश्चात् ही तो वह संघर्ष की सरिता पार कर अंकित करेगा।

वैभव के अमिट चरणचिह्न हम अपना मस्तक आत्मगौरव के साथ तनिक ऊँचा उठाकर देखें, विश्व के गगनमण्डल पर

हमारी कलित कीर्ति के असंख्य दीपक जल रहे हैं। युगों के वज्रकठोर हृदय पर हमारी विजय के स्तम्भ अंकित हैं।

अनन्त भूतकाल हमारी दिव्य विभा से चकित है। भावी की अगणित घड़ियाँ हमारी जयमाला की लड़ियाँ बनने की

प्रतीक्षा में मौन खड़ी हैं। हमारी विश्वविदित विजयों का इतिहास अधर्म पर धर्म की जयगाथाओं से बना है।

हमारे राष्ट्र जीवन की कहानी विशुद्ध राष्ट्रीयता की कहानी है।

-Hindi Poem on Life Struggle by अटल बिहारी वाजपेयी

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