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  1. बेटी वृतान्त Beti Bachao Beti Padhao poem

शोर करने से बेटी यदि बच गई होती, तो लकड़ी की जगह आग में क्यों वह जल गई होती।

पंखा ने बेबसी को उसकी लटकाया होता, चुंदरी जो बचाती लाज उसकी फंदा गले का बनाया होता।

ललिता लक्ष्मी लहू लुहान यों हुई होती, मोती ग्रहस्थी की फिर से दरियां में डुबोई होती।

चिर निन्द्रा नींद गोलियां गले उतारी होती, डी डी टी, बी एच सी मुट्ठी भर खाई होती।

यत्न उतने से ही पली जाई पराई लाडली अलबेली, दहेज दानव ने जान क्यों उसकी ले ली।

शोर नहीं सोच अव अविलम्ब बदलो सहोदर, मुखाग्नि दे बेटी स्वर्ग तो भी मयस्सर।

क्यों पूछते शादी में है लड़की का भाई, बहन सिर्फ होने पर क्यों अनहोनी आई।

क्यों कहते हो बेटा बुढापे का सहारा, कहो संतान देगी नाव बुढ़ापा किनारा।

पूजा पाठ यज्ञ हवन सब बेटियों से भी कराओ, बेटी पैदा होने पर कभी अब लगाओ।

कहते पराया धन कहां मानवता गंवा दी, बेटी की अर्थी पैदा होने से पहले सजा दी।

अब तो बचा लो नहीं तुम भी मिट जाओगे, बेटी होगी तो बेटा कहां से लाओगे।

सक्षम हो बेटी सोच ऐसी अपनाओ, बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ।

– Beti Bachao Beti Padhao poem by डॉ के. पी. वर्मा

  1. बेटी विचार Beti Bachao Beti Padhao poem

अब चलेगी बलि और चढ़ायेंगी, बेटियां भी अपने दम पर जीना सबको सिखाएगी।

किन्तु सांस थोडी बाहर हवा में लेने तो दी गयी होती, मानवता की मलिनता खुद ही धो दी गयी होती।

दूषित सोच समाज की दिखाई तो जाती, क्यों लजाते वे सुमति सुझाई जब जाती।

मार्ग आसान वह जिसे पहले है परखा, मुश्किल है जाना जिसे पहले कभी निरखा।

नयी राह भी कानून को सुझाये, आसान को छोड़ आशानी कौन झंझावात सुलझाये

पर आसानी ने जान मेरी गंवा दी, असंतुलन की स्थिति अनायास ला दी।

इस असंतुल की पीड़ा किसे सतायेगी, बात अलग है कि समझ देर में आएगा।

समझो स्वार्थ मेरा बहाना बना रही हूँ, मै तो सर्व मंगल का गीत गुन गुना रही हूँ।

इस मंगल में शामिल सभी को है होना, नहीं तो एक दिन अवश्य पड़ेगा रोना।

चंदन की रौनक आगे बढ़ानी, बेटा और बेटी में अब समानता है लानी।

– Beti Bachao Beti Padhao poem by डॉ के. पी. वर्मा

  1. सामाजिक स्वीकृति Beti Bachao Beti Padhao poem

हम ने कब सोचा कि बेटी आये, समाज के ढांचे से परेशान हो आए।

समाज के ठेकेदारो ने ऐसी सोच करवाई, जिससे बेटी अब तक उभर पायी।

चारों तरफ उल्लास और हो जाय हल्ला, घर में यदि जाय नया एक लल्ला

उत्सव क्या क्या चहुं ओर मनवाये, नहीं आई बेटी सिर्फ औपचारिकता निभाये

मन की बात देती किसको दिखा, लल्ला के जन्म पर मिठाई कितनी ही बंटवायी।

उपयोगी दोनों ही तब क्यों नकारा, अनंत आत्मा तुम्हारी ने क्यों पुकारा।

मेरी सही तो स्वयं की सुन लो, हूँ जीव जगत का मुझे भी चुन लो।

यही चुनाव तो विशिष्टता बन छायेगा, लिंग भेद तव तो स्वंय मिट जायेगा।

मानवी उपवन तव तो महक जायेगा, बेटा जैसा व्यवहार जब बेटी को जायेगा।

– Beti Bachao Beti Padhao poem by डॉ के. पी. वर्मा

  1. प्रताड़ना पीड़ा Beti Bachao Beti Padhao poem

दयनीय बेचारा क्यों उसको तूने बनाया, बेटा मिला जन्म बेटी ने पाया।

इन्सान दोनों ही फर्क तुम ने बनाया, विवशता बिना बात उनको सताया।

क्यों बिना वजह सोच ऐसी बनायी, बेटा तो हीरो विलेन बेटी बनायी।

मान्यता में दोनो की अन्तर इतना बताया, सभी तरह दबाव बस लड़की पर बनाया।

समाज ने मानसिक रूप से माँ बाप को इतना सताया,

कि हृदय के टुकड़े को अनचाहे मरण शैया सुलाया।

समाज ने सोच ऐसी बदली होती, आत्म ग्लानि बेटी से क्यों हुई होती।

सामाजिक प्राणी को समाज ने ऐसा बताया, कितनी अजन्मी बेटियों का वध अकारण कराया।

समाज संस्कृति यदि हो गया होता तो, अजन्मा बचपन बिटिया ने यों खोया होता।

कुछ भी करो अब बदलाव लाओ, बेटी नहीं विवशता आदर से अपनाओ।

– Beti Bachao Beti Padhao poem by डॉ के. पी. वर्मा

  1. दहेज दुर्दशा Beti Bachao Beti Padhao poem

सरकार के साथ यदि समाज प्रयास करता, तो दहेज रूपी दानव पूरी तरह मरता।

यही तो है जो वैल्यू बेटी कम करवाता, अन्यथा अकारण क्यों कोई अन्तर बेटा बेटी कर पाता।

हालांकि नहीं यह पूरा एक कारण, परन्तु आवश्य है इसका निवारण।

बेटी शादी की चिन्ता करायी समाज द्वारा जाती है, शायद इसी लिए पैदा होने पर होती अक्सर तबाही है।

बेटी नहीं घर है सिर्फ बेटा, कोई नहीं समझते उसको कभी हेटा।

इतना ही नहीं कितना सराहा भी जाता है, अपने कर्मों का फल उसे गिनाया भी जाता है।

कौन कितना कामयाब सोच यह जाती है, बस बेटों की बहुलता ही मन को बहुत भाती है।

कैसे भी शब्द दहेज यदि मिट जाये, असंतुलन के संतुलन पर मानवता टिक जाये।

तब काफी हद तक शब्द बेटी डरायेगा, कलयुगी कारनामों का अन्त अवश्य आयेगा

– Beti Bachao Beti Padhao poem by डॉ के. पी. वर्मा

  1. लज्जा निरूपण Beti Bachao Beti Padhao poem

सिर्फ पेट में खाया पूरा घर बनाया, फिर भी क्यों तुमने बेटी को सताया।

कब समझोगे योगदान इस अनूठी कृति का, देखो रुप इसमें बस रति का।

प्रेरणा श्रोत बेटियां कामयाबी की क्रिया, कामयाब बनाया मर्दों को वह कलयुग हो या त्रेता।

बलिदान की विभूति भी बनकर वे आती, जाने क्यों समता वे फिर भी पातीं।

घर की लक्ष्मी वह अपमान से सताया, जिसकी पूर्ति समाज अब तक कर पाया।

योगदान युगों का है अब तक जारी, कभी नहीं पुकारती है उनकी अब बारी।

पुकार भी कैसे ध्यान चूड़ी कंगन में अटकाया, साज श्रृंगार अलावा सूझ मुश्किल ही पाया।

जागो जननियो जग जाहिर जनाओ, शराफत को पर्याय बेवकूफी अब और बनाओ।

क्यों कि प्रतिबन्धों की भरमार सब तुमने ही पायी, समाज ने कुर्बानियां सिर्फ तुमसे दिलायीं।

लज्जा को भूषण तुम तब तक बनाना, जब तक मानवता याद रखता जमाना।

छोड़ो बन्धन अब बात मान लो, लड़को से कम कभी हमें जान लो।

– Beti Bachao Beti Padhao poem by डॉ के. पी. वर्मा

  1. सज्जनता सुझाव Beti Bachao Beti Padhao poem

सिद्ध हो चुका है कि गधा समझदार प्राणी, फिर भी समाज करता उसके सम्मान को हानि।

सम्मान शब्द उसके साथ सुन होती सबको हैरानी, क्यों कि समाज कर रहा बस अपनी मनमानी।

ऐसा अन्याय क्यों गधे ने पाया, किसी को सोचने का विचार भी आया।

गधा भी शक्तिशाली कम नहीं होता, दिन भर सामान बगैर उफ किये ढोता।

वहीं शाम को वह रूखा सूखा पाया, ही विना ही शिकायत उसने प्रेम से वह खाया।

अगर अधिकारों की मांग उसने भी उठाई होती, तो बेवकूफी का पर्याय जनता स्वयं हटाई होती।

बेटियां हैं विदुषी वीरता अब देखना है, वरना पहचानेगा समाज उनकी कुर्बानी है।

गुणों की पहचान यदि सिर्फ सज्जन करवा गई होती, तो बेटी भी समाज में उचित स्थान पा गयी होती।

कुछ भी करो अव जागरूकता जगाओ, बेटी को भी समाज में उचित स्थान दिलवाओ।

– Beti Bachao Beti Padhao poem by डॉ के. पी. वर्मा

  1. सक्षम Beti Bachao Beti Padhao poem

स्वार्थ नहीं जायेगा तो समस्या भी आयेगा, समाधान हो पायेगा सोच यदि संकुचित अपनायेगा।

परिलक्षित प्रभावी सिर्फ उपदेश अपनायेगा, तव समस्या समाधान आसानी से हो जायेगा।

सोच यदि विस्तृत तव त्याग भी आयेगा, फिर तो लिंग भेद आसानी से मिट जायेगा।

योग्यता ऊर्जा काम कहीं भी दिखलायेगी, संचित होने पर व्यर्थ कभी जायेगी।

तब क्यों सोचा धन पराया बेटी, इसी सोच ने बना दिया उसे हेटी।

अपने पराये में क्यों खाई इतनी बढ़ाई, बेटा तो अपना किन्तु समझी बेटी पराई।

क्या शिक्षा संस्कार तुम्हारे वह साथ ले जायेगी, तब कैसे वह तुम्हारी हो पायेगी।

रहेगी जहां भी देन होगी तुम्हारी, अतः बनाओ उसे किसी तरह विचारी।

विचारवान बन बहको बहकाओ, बेटी की महानता से जीवन उपयोगी बनाओ।

– Beti Bachao Beti Padhao poem by डॉ के. पी. वर्मा

  1. समझौता Beti Bachao Beti Padhao poem

समस्या अनेक उपचार एक, त्याग भावना से हल समस्या प्रत्येक।

धन का लोभ अधिकतर सताता है, इसी से दहेज दानव प्रचंड बन जाता है।

मानवी व्यवहार उस समय फीके पड़ जाते हैं, धन के लोभी जब उभर कर आते हैं।

शादी कर सकते हम कम नैतिकता की खाई, यही निगल लेता है लाडली पराई जाई।

बहाने कितने ही बिन बात बनाये जाते हैं, समझदार भी समस्या समझ पाते हैं।

अन्त में समझौता मजबूरी कराती है, क्यों कि कमजोरी सौ बहाने बनाती है।

सच का शौष्ठव कौन जान पाये, शक्ति है सच यह कौन मान पाये।

कैसे भी बेटी ने यदि शक्ति जुटाई होती, तब धन पराया वह बताई होती।

शक्ति वालो थोड़ा सच को दिखा दो, उसी की कृति सभी प्याला प्रेम तुम पिला दो।

– Beti Bachao Beti Padhao poem by डॉ के. पी. वर्मा

  1. ईश कृपा Beti Bachao Beti Padhao poem

क्यों होता व्यवहार अनूठा बेटी आयी कुनवा रूठा, नहीं बतासे लडडू आये लगता उसको सब हुए पराये।

ऐसा क्या वह कार्य अनूठा सच भी अब तो लगता झूठा, अव्यवहारिक हों अम्मा दादा भूल गये कानून कायदा।

शर्मसार से बचाने हेतु करते कर्म निभाने हेतु, ज्यों टूटा हो जीवन सेतु दशा राहु अब बिगड़ा केतु।

कारण बस एक देय दिखाई छोटू ना आया छोटी आई, जवरन जश्न जुझारू जेते उभर आयें सब विधि से तेते।

सुख साधन यहां सकल घनेरे फिर भी दुख कर रहा बसेरे, कभी उदित करुणा प्रभुताई बांह प्रभु ने पकड़ पाई।

यदि देते वे हमें सहारा क्यों मिलता पुत्र सहारा, पुत्री जाय बुढ़ापा आये कोई हमको देख पाये।

जिसका कोई नहीं प्रभु है उसका किन्तु सहारा चाहिए निज का, शायद ईश्वर का अहसास चाहें स्वावलम्बन की पकड़ें राहें।

उसकी माया अपरम्पार मिलो प्रेम से हो स्वीकार, जानो प्रभु कृपा से पाना अतः कन्या को ठुकराना।

– Beti Bachao Beti Padhao poem by डॉ के. पी. वर्मा

  1. बेटी विशालता Beti Bachao Beti Padhao poem

सुन्दर चित्र यदि बनाओगे तो उसमे बेटी ही पाओगे, किसी ने यदि इसमे शंका जताया तो समझो सत्य मार्ग को झुठलाया।

मानसिक वेदना इस तरह मानवता को पहुंचा कि नर और मादा के बीच की दूरी बढ़ाई,

दूरी भली पर भला भेद भाव सब कुछ होते हुए भी रहेगा अभाव।

भेद भाव भावनात्मक पीड़ा पहुँचाता जिसकी पूर्ति कोई किसी तरह कर पाता,

कभी कुछ हुआ इतना दुखदायी जाति का अपमान विदारक अन्तरमन है भाई।

ईश्वर शक्ति को क्यों कमजोर ठहराया इससे प्रगट होती सोच अपना पराया,

यह सोच किसी तरह सुरुचिपूर्ण कहलायेगी क्योंकि सोच नकारत्मक साथ इसमें जायेगी।

समय की मांग दोषी बेटी ठहराओ ईश्वर की श्रेष्ठ कृति भाव आदर जगाओ।

हीनता किसी तरह यदि उर में समायी तो सन्तति के साथ होगी स्यंव को दुखदायी।

अतः अव बेटियों को पूर्ण आदर दिलाओ संसार में चहुं और खुशियां ही पाओ।

– Beti Bachao Beti Padhao poem by डॉ के. पी. वर्मा

  1. बेटी विशेषता Beti Bachao Beti Padhao poem

कैसे बेटी को धन पराया बताया जबकि उसने चहुं ओर साया ममता फैलाया।

मैं और मेरी है माया सव जाने माया की उलझन को बुरा मानें।

तव क्यों तुमने अपना पराया बनाया माया का जाल क्या और नहीं फैलाया।

है माया ठगिनी कबीर यह बताये अपने पराये से भाव क्या और नहीं गिराये।

सोचो तो शरीर भी अपना नहीं होता तव फिर कौन पाये कौन खोता

किन्तु सोच यहां तक पहुंच पायी इसलिए अपने पराये की भावना उसमें उमगाया।

वसुधैव कुटुम्बकम कानून को बतायें सुलभ समझ उनकी अपने पराये ही आये

आम बात है कि स्वार्थ सभी को सताता है बिरला योगी ही इससे उभर पाता है।

स्वार्थ की सीमा सोच बेटी भी लांघ पाई इसलिए समाज ने उसकी दशा ऐसी बनाई।

सिर्फ सोचने का नजरिया कौन अपना पराया सोच हुई सकारात्मक तो कुछ अपना पराया।

अब सोच ऐसी अपनाओ कि ऐसा कभी जताओ और कुछ करो किन्तु बेटी पराई बताओ।

– Beti Bachao Beti Padhao poem by डॉ के. पी. वर्मा

  1. सही सोच Beti Bachao Beti Padhao poem

विषाक्त सोच समाज की बेटी ने जो पाई उदार भावों ने अब तक कोई योजना बनाई।

एक तरफ सहानुभूती यों का भण्डार मिल जाता है अन्तिम गति वही जिसे वंचित वर्ग पाता है।

अर्थहीन सहानुभूति शायद कमजोर ही बनाती है क्योंकि वह उसके आत्मविश्वास को जड से हिलाती है।

कितनों ने उसके आत्मविश्वास को सुदृढ़ बनाया अन्तर अभी तक अनुत्तर ही गया पाया।

सोच की सुगन्धि उस तक पहुंच पायी कैसे तव हो इसकी जीवन में भरपाई।

अर्थहीन उदारता जव भी गयी दर्शायी छले हुए वह और भी छलवायी।

उसकी विमुक्ति धारा अब उसे ही बात है उभरने की शैली अपना वह पाती है।

मधु मिश्रित जहर उसे ऐसा पिलाया जाता है कि आत्मविश्वास उसका पनप नहीं पाता है।

मधु मिश्रित जहर स्त्रीत्व उसका अपना होने देता पूरा जीवन का अधूरा सपना

स्त्रीत्व बन मातृत्व सम्मान जव पाता है तब तो उसको सराहा खूब जाता है

किन्तु क्या सिर्फ मातृत्व से काम चल जायेगा जीवन का जस क्यों विन मातृत्व सरसायेगा।

सोच हो सुवासित तो बेटी सरसायेगी कोई भी शक्ति उसे तब रोक नहीं पाएंगे।

– Beti Bachao Beti Padhao poem by डॉ के. पी. वर्मा

  1. अदृश अनुभव Beti Bachao Beti Padhao poem

सोच सकारात्मक अपनाओ तो सब कुछ ठीक ही पाओ, सोच में खोट आया तो सब कुछ खराव ही पाया।

सुविधाजनक बनेगा सब कुछ यदि है अच्छी सोच, खोट उदय यदि हुआ सोच में सब बने योजना पोच।

इसी विधा में विकसित बेटी हुई नकारात्मक सोच शिकार, इसलिए दिखते हैं उसमें कितने आज विकार।

कितने आज विकार समझ गुण वे पावें, विन बेटी कल्पना जगत सच कैसे हम माने।

फिर भी रहे नकार व्यथा पहचान पावें, बैठ रहे जिस नाव छेद उसमें करवावें।

बेटी बिना बिना बितान अधूरे ही पाओगे, नहीं मिलेगा खोने पर ना कुछ कर पाओगे।

अभी दिखयी देय अतः करते परवा, कुछ समय के बाद जीवन हो कड़वा हलवा।

जितनी जुगत जुराउ नहीं हल इसका होगा, जो तुम करते आज वही तो कल तुमने भोगा।

नहीं भूल अब करो बचाओ सब विधि बेटी, तब जग में होय किसी की किस्मत हेटी।

– Beti Bachao Beti Padhao poem by डॉ के. पी. वर्मा

  1. बेटी विमुख Beti Bachao Beti Padhao poem

स्वार्थ है कितना अनिष्ट क्या क्या करवाता है, अपने ही खून का सर्वनाश वह करवाता है।

बननी थी प्यारी लाडली बिना बात उजड़ गया, कौनसी विडम्बना ने मन को उकसाया।

प्रेम मयी वात्सल्य बस भी कर कुछ वह पायी. जाने किस लाचारी में कोख खाली करवाई।

मानवी मूल्य कर मंडित वह ऐसी अलसाई, कोख की कमनीयता बिन बात वह लुटवाई।

उत्पत्ति में बाधित हो सुगमता कैसे पायी, जिसको आना था दुनिया में राह बन्द वह करयी।

होना सहायक उत्पत्ति में नहीं है कोई पाप, किन्तु बेटी को ही माना क्यों अभिशाप।

द्रव की विडम्बना ही दोष करवाती है. भयंकर भूल की भरपाई हो पाती है।

सोचता तभी है मानव दिखाई जरूरत जव देती है, बेटी, बेटी की विडम्बना सह कैसे वह लेती है।

कैसी भी हो माँ दुश्मन बच्चों की होती, किन्तु कर विनास बच्चा कहो कहाँ वह रोती।

कैसा यह दुर्भाग्य समझ कोई पाया, बेटी की विडम्बना कि स्वर संवेदना आया।

दूर करो दुर्दान्तता नयी सोच अपनाओ, चाहे कुछ भी करो किन्तु अब बेटी बचाओ।

– Beti Bachao Beti Padhao poem by डॉ के. पी. वर्मा

  1. पुकार Beti Bachao Beti Padhao poem

बेटी ने पुकारा कैसे माँ बाप तुम्हारा, आँखों के सामने कर दिया विध्वंस सारा।

क्या तुम्हारी मजबूरी शायद की इच्छा अपनी पूरी, किन्तु कैसी यह चाह समझा मारना मुझे जरूरी।

यदि उतना था तो आधा पेट खाना, कुछ सही फिर भी देख तुमको अघाती।

अपनत्व यदि पाती तो कुछ अच्छा रह जाती, क्रिया की प्रतिक्रिया तुम्हें कुछ तो अवश्य दे पाती।

पर समूल नष्ट अनायास मेरा जो किया, संघटित ऊर्जा को छितरा व्यर्थ क्यों दिया।

अगर इतना ही डर था तो खुद क्यों जिए, तुमने भी प्राण बस बेबस के हर लिए।

कायरता की कुरूपताएं यदि उस समाज पर दिखायी होती, तो बेटों की तरह बेटियाँ आज खूब सरसायी होतीं।

बेबसी मेरी किन्तु तुम हरशाये मानो नाकामयावी पर वाहवाही लुटाये, अनुपयुक्त उदारता या कायरता दोनों ही तरह मुझे ही मरवाये।

ऐसा अब हो कि देख मानवता सिर झुकाए, बेटा ही नहीं अब जिन्दा बेटी भी रह पाये

– Beti Bachao Beti Padhao poem by डॉ के. पी. वर्मा

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